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تنهيدة
الليل
والنايات
والوتر |
نقشن في
القلب ما
لا ينقش
الخطر |
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وفتنتان
تركت القلب
ملكهـما |
قصد القصيد
وطيب
الراحل
العطر
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لي مهجة
مثل نور
الفجر
مرهفة |
تستلهم
الوعد
بالرؤيـــا
وتنتظر |
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أتعبتها
باصطحاب
الناس في
زمن |
إن سر
ساءوا وان
سروا فقد
فجروا |
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ثم اصطفيت
رجالا كنت
اعرفهـم |
إن آلموا
أسفوا أو
يقدروا
غفــروا
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وسرني
أنهــــا
كانت
مخاطرة |
مع
المخاطـر
لولا
خانهـا
الحذر |
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ورغبة
كاستباق
الخيل
جامحة |
بأحسن
الحسن،
والرغبات
تنتحر |
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وشهوة
لجمال
العيش
اعشقها |
وفي
الليـالي
أداريهــا
فتستعر |
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وأمنيات،
وقد زخرفت
رونقها |
غـدون لـي
لا حكايات
ولا صور |
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ولا خطرن
على قلب
ولا بصر |
ولا مررن
بسمـع يسمع
البشر |
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ولي على كل
درب مهجة
وهوى |
وعين قـلب
بها يستبصر
البصر |
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وموطن
عندما
فارقت
منزله |
كأنما أرقت
في مهجتي
السير |
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يا من تتوق
إلى اكناف
مجلسه |
نفسي،
ويشتاق
رؤيا نوره
النظر |
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علم عيوني
دروب الحب
من سعة |
فقد ضللت
وضلت في
الهوى
الزمر |
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وإنني
اشتهي من
فيك
منطقـــه |
كما يشوق
الفتى في
الظلمة
القمر |
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وارقب
الضوء لما
غاب مطلعه |
فأنت
خبــرت أن
الملتقى
سحر |
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كيف المسير
ولا صحب
فيرفق بي |
ولا بشير
يوافيني
ولا نـــذر |
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ووجهتي
رغبتي
والشوق
يعصف بي |
ومركبي
ألمـي
والبحـر لا
يذر |
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ولا أصاحب
قومــــا
للذي صنعوا |
إلا بما
كان في
الخير الذي
نشروا |
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أسابق
الصبح في
عسر وفي
يسر |
فساعة
العسر قد
لا ينفع
اليسر |
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ورغبتي
كاستباق
الخيل
جامحة |
بأحسن
الحسن ،
والرغبات
تنتحر |