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غير مجد
هذا الأسى
والشرود |
ما مضى قد
مضى، وليس
يعود
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إن نفسي،
وان بدوت
قنوعـا، |
يطلب
المجد،عزمهـا،
فتسود |
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ما أردنا
سوى
الجمـال
وسرنا |
في السرى،
باحثين
عمـا نريد |
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فانتعلنا
شوك الطريق
حجـولا |
لا صعـاب
تردنا، أو
حــدود |
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واتخذنا
رحب الفضاء
مسارا |
تأمل النفس
أن فيــه
الصعـود
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همنــا همة
تعالت
وفينــا
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بدن لا
يطـاق فيه
الخلــود |
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فالذي يرفع
البديـــع
بديـع |
والذي
يمنع
الشديد
شديـــد
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ايهـــذا
الظلام لست
أبالي |
أقديــم
بدربنـا
أم
جديــد |
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إن لي في
ظلامك
الصعب نفس |
أبصرت
دربها
وفكـر
وقيـد |
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أبلت
الرغبة
الجليلة
جسمي |
بالتباريـح،
والفـؤاد
حديــد |
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وعلى أصعب
الدروب
طموح |
واثق خطـوه
وسير
وئيـــد |
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فالذي يصنع
البديــع
بديع |
والذي
يمنــع
الشديد
شديد
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لو صفت هذه
الليالي
فكانت |
ليس فيها
على الكرام
قيود
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أو أباحت
لنا كؤوس
ألاماني |
فسقانا
بها المقام
الرغيد
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لحملنا
البشرى إلى
الناس حتى |
سبقتهم
إلى
الصحاري
الورود |
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إن فينا
لكل خطب
جواد |
ولدينا لكل
حسن شهيد
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وعلمنا ما
كل آت
بشير |
وعرفنا
ما
كل
ماض
مجيد |
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بالضنى
والمنى
وصبر جميل |
اغلب
الدرب،
والدروب
تميد
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سائر لا
يردني كيد
رهط |
حين كادوا،
والعاذلات
تكيد |
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قد ضربنا
في كل ارض
ضروبا |
ورجعنـا من
الرضا
نستزيد |
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ورجائي متى
بلغت رجائي |
في الجمال
الطهور حيث
يجود |
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إن فينا
لكل خطب
جـواد |
ولدينـــا
لكل حسن
شهيد |