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ما كان،
كان، وما
وجدت
بديلا |
إني
صبرت
على
جفاك
طويلا |
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اليوم اترك
في يديك
قرارها |
وأسير
اجهل
للمسير
سبيلا |
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لملمت دمعي
واحتسيت
هزيمتي |
واخترت
موتي في
هواك رحيلا |
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ما كنت
أرضى قبل
حبك
بالردى |
حتى بعثت
إلي
منه
قبيلا |
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أنت الذي،
أثملتني
وثملت بي، |
وأنا الذي
حسب الزعاف
شمولا |
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وسواي
من
يرضى
هوان
فؤاده |
وسواك
من
يرضى
المحب
ذليلا |
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ولقد علمت
وقد حكمت
بأننا |
نرخي على
الماضي
الجميل
سدولا |
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يا من سقيت
القلب نخب
هلاكه |
لا تسقه
نخب
الحياة
قتيلا |
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وجزيته
خيرا ببعض
وفاءه |
لا تجزه
بعد
الكثير
قليلا |
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أرسلت عيني
نحو دربك
صبوة |
فسمعت من
بين
الضلوع
صهيلا |
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لا اشهد
الرحمن
عينك دمعة |
وجدت
لها في
وجنتي
مسيلا |
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فلقد حننت
إلى الذين
عرفتهم |
وتركت
فيهم
للغرام
رعيلا |
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وصبأت عن
عهد الفراق
بليلة |
وذكرت
عهدا
كان
فيك
جميلا |
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فإذا سألتك
أن تعود
فإنني |
اشفي
فؤادا
لا
يزال
عليلا |
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تشتاقك
النفس التي
أشقيتها |
وبها
إليك
محبة
وغليلا |
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ما بين
قربك
وابتعادك
فارس |
كان النبيل
ولا يزال
نبيلا |
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بيديك كنت
زرعت بستان
الهوى |
وبهن عاد
كما أردت
محيلا |
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أغرقت بعد
قرار موت
غرامنا |
سفني
ورحت
به
اجر
ذيولا |
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فلكم مددت
يدي إليك
مؤملا |
ورددتها
تشكو
أسا
وذبولا |
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ولقد كذبت
عليك حين
سالتتي |
إن كان
صبري في
الفراق
جميلا |
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لكن قلبي
مثلما
علمته |
بالامس
يرجو
للزمان
قفولا |
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وبقربك
الأحلام كن
رفاقنا |
وعلى
دروب الهجر
صرن فلولا |